परिचय
नव नाथों में प्रथम लौकिक नाथ ब्रह्मा जी के अवतार योगीराज अघोराचार्य बाबा सत्यनाथ का यह स्थल आदि गंगा गोमती और लुप्त प्रायः प्राचीन चंद्र भागा नदी के पवित्र संगम पर स्थित है। चूंकि आदि गंगा गोमती जहां से दक्षिण वाहिनी होकर पुनः दक्षिण वाहिनी हुई है। यह पूरा क्षेत्र धोपाप के नाम से विख्यात है। मान्यताओं के अनुसार भगवान श्री राम ने लंकाधिपति रावण के वध से उत्पन्न पाप के शमन के हेतु यहीं आकर स्नान किया था। अतः यह क्षेत्र धोपाप के नाम से जाना गया। इसी धोपाप के दक्षिण छोर या अंतिम छोर पर स्थित है यह पुण्यतम तपोभूमि ।
विष्णु पुराण के अनुसार आदि गंगा गोमती के इस दक्षिण मार्गी प्रवाह को धूतपाप कहा गया है। इस प्राचीनतम मठ का जीर्णोद्धार महाराज विक्रमादित्य और सम्राट हर्षवर्धन के द्वारा प्राचीन काल में कराया गया ।
जब जौनपुर सल्तनत में इब्राहिम शाह शर्की का शासन था जो कि देवालयों के विध्वंस के लिए कुख्यात था द्वारा राजा अल्दे के हर्षवर्धन कालीन किले पर आक्रमण हुआ तो किले के निकट होने के कारण मठ का भी विध्वंस कर दिया गया। काल प्रवाह से यह मठ घनघोर वनों से आच्छादित होकर जन सामान्य के दृष्टि से विस्मृत हो गया परन्तु जन भावनाएं सदैव इस स्थल से जुड़ी रही और लोगों के हृदय से बाबा सत्यनाथ और उनसे जुड़ी कथाएं और उनके चमत्कार सदैव गुजरते रहे ।
विधर्मियों ने इस पर अनाधिकृत रूप से अपना हक जताने का प्रयास किया फल स्वरूप शैव साधना का यह प्रमुख तीर्थ जिसने सनातन परंपरा की पताका को सदैव ऊंचा उठाए रखा लोग यहां आने से कतराने लगे। भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के स्वर्णिम काल में या पुनीत स्थल एक बार फिर नए कलेवर में अपनी प्राचीनता को समेटे हुए अपने भक्तों की बाट जोह रहा है। मठ का इतिहास त्रेतायुग से लगाए इस कलिकाल तक अबाध रूप से जनमानस की दंत कथाओं और स्मृतियों में पूरी तरह सुरक्षित है। आज भी देश-विदेश के साधक अघोर और नाथ संप्रदाय के शैव साधक यहां साधना करते देखे जा सकते हैं। इस स्थल ने अन्य संप्रदायों के भी योगियों, संतो, साधकों को सिद्धि प्रदान कराई है ।
